शनिवार, 21 अक्टूबर 2017 | 06:57 IST
दूसरों की बुराई देखना और सुनना ही बुरा बनने की शुरुआत है।
होम | विचार | अकेले सफर करने का माद्दा

अकेले सफर करने का माद्दा


अंजलि सिन्हा

पटना की गीता को जब दिल्ली के एक कालेज में प्रवेश के लिए आना पड़ा तो उसने अपनी यह यात्रा अकेले ही की, किसान परिवार से सम्बद्ध उसके माता पिता के लिए यह मुमकिन नहीं था कि वह उसका साथ देते। या हैद्राबाद की राधिका, जो वहां विश्वविद्यालय में रिसर्च स्कॉलर है, उसे जब फील्ड स्टडी के लिए उत्तर भारत के पहाड़ी इलाकों में जाना होता है, वह अकेले ही आती जाती है ; या वही स्थिति लखनउ की किसी संस्था में काम करनेवाली आयेशा का है, जिसे अकेले ही सफर करना पड़ता है।

गीता हो या राधिका हों या आयेशा हो, इन सभी युवतियों, महिलाओं को अपवाद नहीं कहा जा सकता। हाल में भारत सरकार के नेशनल सेम्पल सर्वे की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट /हिन्दुस्तान 17 जुलाई 2016/ के जो अंश अख़बारों में प्रकाशित हुए है, वेयही बताते हैं कि देश भर में चालीस फीसदी महिलाएं अकेले घूमती हैं। वे तमाम आशंकाओ को पार पाकर घूमने को आगे आ रही हैं। यद्यपि कई राज्य अभी बहुत पीछे हैं, लेकिन कुछ जैसे पंजाब, तेलंगाना, केरल, आंध्रा, तमिलनाडु आदि आगे हैं। यह क्रमशः 66 फीसदी, 60 फीसदी, 58 फीसदी, 53 फीसदी तथा 55 फीसदी का है। इनमें पिछड़े राज्यों में जहां बिहार 13 फीसदी, हरियाणा 13 फीसदी दिखते हैं, वहीं इस मामले में सबसे ख़राब स्थिति दिल्ली की है जहां यह प्रतिशत 10 फीसदी तक ही है। सर्वे के मुताबिक ग्रामीण महिलाओं का फीसद शहरी महिलाओ से आगे है- ग्रामीण 41 फीसदी और शहरी 37 फीसद। शायद इस बदलाव का कारण होगा कि ग्रामीण इलाकों से पढ़ने या कैरियर बनाने के लिए शहर तक जाना ही होता है और लड़कियों में पढ़ाई के प्रति झुकाव बढ़ा है।

अगर हम उपरोक्त सर्वेक्षण के आंकड़ों को विस्तार से देखें तो पता चलता है कि अपने कारोबार के सिलसिले में अकेले सफर करनेवाली महिलाओं की संख्या 2 फीसदी थी। इसकी वजह शायद यही रही होगी कि अभी भी स्वतंत्रा व्यवसायी महिलाओं की संख्या पुरूषों की तुलना में बहुत पीछे है। वे छोटा मोटा व्यवसाय अपने आसपास कर लेती हैं, लेकिन बड़े बिजनेस में अभी नहीं उतरी हैं। पढ़ाई के लिए अकेले यात्रा करनेवाली लड़कियों की संख्या 21 फीसद पायी गयी जो कि एक बड़ी वजह है। अधिक विस्तार में जाएं तो अन्य वजहें भी दिखें - जैसे हाल में महिलाओं के छोटे छोटे ग्रुप में अकेले कहीं घूमने जाने की ख़बरें आती रहती हैं, कुछ टूर कम्पनियों द्वारा इसके लिए विशेष पैकेज टूर भी बनाए गए हैं - लेकिन मूल बात यह है कि अब वे सफर पर अकेले निकल जाने का हौसला रखती हैं। इस बदलाव पर ध्यान आकर्षित होता है क्योंकि हमारे समाज में महिलाओ का अकेले बाहर निकलना एक तरह से वर्जित रहा है, अमूमन वे परिवार के पुरूष सदस्यों के साथ ही यात्रायें करती थीं तथा अकेले आने जानेवाली महिलाओं को अच्छी निगाह से देखी नहीं जाती थीं। निश्चित ही पहले जो महिलाएं अकेले यात्रायें करती होंगी उन्हे ज्यादा मुसीबतों का सामना करना पड़ता होगा; परिवार के विरोध तथा असहयोग के अलावा समाज के लिए भी वे अजूबा बन जाती होंगी, लेकिन अब समाज में भी इसकी स्वीकार्यता बढ़ी है।

मशहूर साहित्यकार, लेखक महापंडित राहुल सांक्रत्यायन ने तो अपनी बहुचर्चित किताब ‘घुमक्कड शास्त्रा’ में गोया आनेवाले समय की आहट चित्रित की थी और उन महिलाओं/तरूणियों का भी उल्लेख किया था जो बीती सदी के तीसरे दशक में उनकी विभिन्न यात्राओं में उनसे अकेले घुमक्कडी करती मिली थीं, जिनमें न केवल विदेशी महिलाएं थीं बल्कि एशियाई महिलाएं भी थीं। इतनाही नहीं उन्होंने मशहूर विदुषी गार्गी का उल्लेख करते हुए जिसने भरी सभा में याज्ञवल्क को चुप करा दिया था, बताया था कि ‘आज से 26-27 सौ वर्ष पहले और अधिक घुमक्कड तरूणियों को देखेंगे। मिथिलापति जनक की परिषद में याज्ञवल्क्य की हुलिया तंग करनेवाली गार्गी एक घुमक्कड महिला थी।’

वैसे जहां यह सकारात्मक है कि महिलाएं अकेले घुमने जाने का साहस जुटा रही हैं, वहीं यह बात भी रेखांकित करनेवाली है कि उन्हें कितने स्तरों तक कहे अनकहे बंधनों का सामना करना पड़ता है, उनकी गतिशीलता पर रोक लगाने के कितने प्रयास लोगों की तरफ से चलते रहते हैं। और उन्हें कितनी बाधाएं अभी पार करनी हैं। मिसाल के तौर पर जब कुछ साल पहले दिल्ली में यौन अत्याचारों की घटनाओं में तेजी देखी गयी थी, तब एक कानूनविद/एक्टिविस्ट में एक राष्ट्रीय अख़बार में लिखे अपने लेख के जरिए यह समझाने की कोशिश की थी कि हमारी रहने की जगहें - हमारे शहर या नगर - किस कदर जेण्डरीकृत हैं अर्थात स्त्रा-पुरूषभेद पर टिकी हैं। छोटी-छोटी बातों का उल्लेख करके उन्होंने समझाया कि किस तरह पितृसत्तात्मक छाप लिए शहर स्त्रा की गतिशीलता को नियंत्रित करते हैं। उदाहरण के लिए स्ट्रीटलाइट का न होना किसी के लिए सामान्य नागरिक सुविधाओं की कमी का एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन वह आधी आबादी को अंधेरा होते ही घरों में कैद होने के लिए मजबूर कर सकता है। उपरोक्त कांड के बाद दिल्ली सरकार के तत्कालीन मुख्य सचिव की अध्यक्षता में बने एक कोर ग्रुप की रिपोर्ट -जिसने शहर के पूरे वातावरण को सुरक्षित बनाने के लिए सेफ्टी आडिट किया था और जनता से सुझाव भी मांगे थे - के निष्कर्षों को देख कर यही दिखा था कि इस मामले में शहर की बुनियादी सुविधाओं में कोई गुणात्मक फरक नहीं पड़ा था। (देखें, द हिन्दू, 17 अगस्त 2014)  और फिर यही प्रश्न उठा था कि जबकि हजारों की तादाद में लोगों ने सड़कों पर उतर कर महिलाओं की सुरक्षा बेहतर करने पर जोर दिया हो, तबभी सरकारी महकमे पुरानी गति से, पुराने ढर्रेपर ही क्यों चल रहे हैं। मालूम हो कि समाज में निर्णायक पदों पर में बैठे लोगों में इस बात का एहसास नहीं बन पाया है कि शहर पर पड़ी पितृसत्ता की छाप आधी आबादी की गतिशीलता को काबू में रखने का जरिया बनती है और इसलिए आम तौर पर आलम यही होता है कि अंधेरा होते ही महिलाओं का सड़क पर नज़र आना मजबूरी की तरह देखा जाता है।

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह हमारा समाज जो इतना असुरक्षित है वहां औरत के लिए उसमें घूमना-फिरना कैसे बढ़ता जा रहा है, जबकि हिंसा तथा यौन हिंसा की घटनाएं कम नहीं हो रही हैं। दरअसल यह हक़ीकत भी लोगों के सामने स्पष्ट होती जा रही है कि यौनहिंसा की घटनाएं अनजान-अपरिचितों के बीच ही नहीं बल्कि शहर-गली-मुहल्लों में, अपने परिचित दायरों में भी घट रही है। दिल्ली पुलिस के सालाना आंकड़े इस पर रौशनी डालते रहते हैं। इसलिए बचाव के लिए घर में कैद होने का कोई फायदा नहीं बल्कि सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षा तथा एहतियात जरूरी है।

यह भी जानना जरूरी है कि अकेले यात्रा की सबसे बड़ी वजह घूमने के लिए निकलना नहीं बल्कि आज की वह जरूरत है। जैसा कि सरकार का यह सैम्पल सर्वेक्षण भी दर्शाता है कि ग्रामीण क्षेत्रा से महिलाएं शहरों को अधिक आती हैं /41 फीसदीॅ यानि गांव या छोटे शहरों से वे महानगर क्यों जाती होंगी हम इसका आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं। आने वाले कुछ दशकों में हालात और तेजी से बदल सकते हैं तथा अकेले या साथ यात्रा करना कोई बड़ी बात नहीं मानी जाएगी।

इस बदलाव के मददेनज़र समाज में महिलाओं के खिलाफ भेदभाव या हिंसा का व्यवहार कुछ हद तक स्वतः बदलेगा क्योंकि युवा पीढ़ी साथ साथ पढ़ने लिखने तथा काम करने में स्वाभाविक होगी, महिलाएं भी प्रतिरोध की स्थिति में होंगी। लेकिन इसके बावजूद समाज को तथा सरकार और प्रशासन को महिलाओं के लिए सुरक्षित यात्रा एवं सुरक्षित समाज मुहैया कराने के लिए स्पष्ट नीति एवं कारगर कानून को प्रभावी बनाना होगा।  आज के समय में महिलाओं को घर की चहारदीवारी तक सीमित रखना न ही सम्भव है और न ही उचित है इसलिए वे बाहर आएं तो सामनता और बराबरी की शर्तें पूरी होना आधुनिक समय की सबसे बड़ी जरूरत है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सभी लड़कियां और महिलाएं उमड़ पडेंगी, वे समाज में अपनी भूमिका और जिम्मेदारियां निभाते हुए बाध्य कर देंगी कि समाज बदले।

राहुल सांक्रत्यायन की भविष्यवाणी यही थी जिसमें उन्होंने लिखा था ‘‘घुमक्कडी मे तरूणियों को पीछे नहीं रहना है, बस यही वज्र संकल्प होना चाहिए, फिर सारे रास्ते अपने आप खुल जाएंगे।..‘भारत की विशेष परिस्थिति में चाहे उनके लिए कितनी प्रतिकूलता हो, पर तरूणियां अपने लिए घुमक्कडी का रास्ता प्रशस्त कर सकती है।‘  

 



© 2016 All Rights Reserved.
Follow US On: