शनिवार, 21 अक्टूबर 2017 | 06:58 IST
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समाज साहित्य में जीवित रहता है, और साहित्य भाषा में


समाज साहित्य में जीवित रहता है, और साहित्य भाषा में

 श्रवण सेमवाल

मानव का जीवन मानवीय मानसिकता के उत्तरोत्त चिंतन एंव मनन के हर काल, हर क्षण मुख्य बिषय रहता है। क्योकि मानव की जो सोच है वह बदलती रहती है, बदलाव की ओर ही उसका पहला झुकाव होता है। हम एक ऐसे समाज में रहते है, जहां भावनाओं को व्यक्त करने के लिए भाषा ही शक्ति है, स्वाभाविक रूप से, हम भाषा से ही संचार करते है। और भाषा से ही साहित्य का निर्माण होता है । दूसरे शब्दों में कहे तो साहित्य की विषय-वस्तु समाज या अन्य किसी रूप में भी हो सकती है। कवि अपनी भावना को व्यक्त करता है और हम उनकी कविता को पढ़ते है, कवि मानता है कि जो रुचि रखते हैं उसे वह कविता खुद के साथ प्रतीत होती दिखाई पड़ती है साहित्य सामाजिक सहानुभूति व्यक्त करता है, स्वाभाविक रूप से यह हमारे मन और रवैये पर कुछ सकारात्मक प्रभाव व्यायाम करने के लिए बाध्य है। यह समाज के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त करता है, समाज को साहित्य में ही जीवित रखने का तरीका है। एक प्रेरक कविता समाज पर सामान्य प्रभाव पैदा करती है। यह हमारी भावनाओं और कल्याण के लिए उत्साह का मार्ग होता है ।

काव्य और साहित्य आम तौर पर एक शांत और विनीत रास्ते पैदा करते है। उपन्यास मानव मन की दिशा को बदल देता है इतना ही नही यह हमारे जीवन के तरीको को भी बदल देते है।

 

साहित्य का प्रभाव समाज पर सीधे या परोक्ष रूप से महसूस किया जा सकता है । चाहे किसी भी उपन्यास को ले वह समाज के लिए जागृति का वाहक बना है। शरतचंद्र का उपन्यास हमारे समाज में महिलाओं का संबंध देश से रूढ़िवादिता को तोड़ना था

इसी प्रकार से  साहित्य समाज बनाता है। यही नही सहित्य को तो समाज के आईने के रूप में वर्णित किया जा सकता। माना जाता है कि सहित्य, संगीत, और कला से विहीन व्यक्ति दंतहीन शेर के समान होता है, इसके लिए यह उक्ति भी कहीं गई है कि साहित्य, संगीत, कला, विहीन: साक्षात पशु पुच्छ विषाण हीन:  लेकिन किसी भी साहित्य की गुणवत्ता और प्रतिबिंब का स्वभाव उस लेखक के रवैये पर निर्भर करता है कि क्या वह अपने आउटलुक या प्रतिक्रियावादी में प्रगतिशील है।

 

 



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