शुक्रवार, 15 दिसम्बर 2017 | 01:56 IST
दूसरों की बुराई देखना और सुनना ही बुरा बनने की शुरुआत है।
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श्रोताओं के मन को स्पर्श करती है रेडियो की ध्वनि...


जब नील नदी की लहरों की कलकल सी गुनगुनाती ध्वनि ‘’मुझे छूती है, तुम्हें छूती है’’ तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे मधुर स्वदरों में कोई कैरॉल गा रहा हो, ऐसे ही रेडियो की ध्वनि श्रोताओं के मन को स्पार्श करती है। दुर्गम भौगोलिक विभाजनों की सीमा से परे रेडियो अनगिनत ज़िन्द गियों को छूता है और इसके बावजूद भी परदे के पीछे बना रहता है। एक ऐसे अच्छे  मित्र की तरह जो बुरे दिनों में सहायता के लिए हमेशा तत्पभर रहता है लेकिन उसका प्रतिफल कभी नहीं चाहता। जैसे प्राकृतिक आपदाओं के आने पर दुनिया बार-बार इसे महसूस करती है। जब प्रकृति के इस रोष का सामना करने में सभी नये मीडिया माध्यनम असफल हो जाते हैं तो ऐसे में एकमात्र रेडियो ही है जो लोगों से, ज़िन्दयगियों से और आशाओं से जोड़ता है।  रेडियो के लिए ये गौरव का विषय था जब संयुक्तभ राष्ट्र् ने, रेडियो कैसे हमारे जीवन को एक नया आयाम देने में मदद कर सकता है, इस परिकल्प ना के साथ वर्ष 2011 में 13 फरवरी को विश्वन रेडियो दिवस मनाने की घोषणा की।  यूनेस्कोर वेबसाइट से उद्धरण के अनुसार, ‘’अपने श्रोताओं को सुनते हुए और उनकी जरूरतों पर प्रतिक्रिया देने के लिए, रेडियो हम सबके सामने आने वाली चुनौतियों के आवश्य क समाधान की दिशा में विचारों और आवाज़ों की विविधता प्रदान करता है।‘’

 यह उन विकासशील समाजों के लिए सर्वाधिक प्रासंगिक है जो नवीनतम सूचना प्रौद्योगिकियों की पहुंच से वं‍ि‍चत हैं। वैश्विक स्तीर पर अत्यािधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी का बदलाव ग़रीबों की तुलना में अमीर राष्ट्रोंय को अनुचित लाभ पहुंचायेगा, इससे महसूस होता है कि तीसरी दुनिया का आधार रेडियो ही है। रेडियो का प्रसारण एकाकीपन और निरक्षरता की बाधाओं को पार करता है और यह प्रसारण एवं आदान करने का सबसे सस्ताग इलैक्ट्रॉ निक माध्य म भी है। हालांकि विश्वओ रेडियो दिवस के शुभारंभ को मात्र छह वर्ष ही हुए हैं, लेकिन 1927 में बॉम्बे  में इंडियन ब्रॉडकॉस्टिंग कंपनी के पहले रेडियो स्टेशन की स्थापना के साथ भारत में रेडियो की अपनी एक लंबी कहानी है, जो वास्तकव में 90 वर्ष पुरानी है। रेडियो भारत में 1.25 अरब की आबादी के साथ जातीय-सामाजिक-भाषाई विविधता, साक्षरता स्ततर, आर्थिक असमानता, लिंग असमानता, संसाधनों के वितरण में असमानता, ग्रामीण-शहरी अंतर और डिजिटल अंतर जैसी सर्वाधिक असंभव चुनौतियों का सामना करता है। लोक सेवा रेडियो प्रसारक के रूप में, ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) ने एक प्रज्ञता समाज/ज्ञानवान समुदाय के विकास सहित वैज्ञानिक विकास, महिलाओं के सशक्तीकरण, वंचितों को लाभ, अभिभावकता और कृषि नवाचार का प्रचार, ग्रामीण उत्थािन, जन सांख्यिकीय लाभांश के लाभों को प्राप्त् करने के लिए कौशल विकास, भारत की सांस्कृ तिक, भाषीय और जातीय विविधता को मज़बूत बनाने और संरक्षण देने के साथ-साथ भारत की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष परंपराओं एवं मूल्योंष के विकास पर पूरी तरह से ध्यारन केंद्रित करते हुए इस चुनौती का सराहनीय रूप से सामना करते हुए आगे कदम बढ़ाया है। यही कारण है कि प्रख्यानत कृषि वैज्ञानिक और हरित क्रांति के जनक एम.एस. स्वाहमीनाथन ने रेडियो के विकास की पहल की सराहना इन शब्दों  में की है: यहां तक की वे लोग जिन्हेंस प्रौद्योगिकीय परिवर्तन से बाहर रखा गया उन्हेंी इसमें इसलिए शामिल किया जा सका क्योंृकि उन्हों ने रेडियो के माध्य्म से नई प्रौद्योगिकियों के बारे में सुना। वास्तनव में मुझे 1967-68 की बात याद है जब उत्तोर प्रदेश और बिहार के बहुत से किसानों ने चावल, गेंहू और अन्यव फसलों की नई किस्मोंि का शुभारंभ किया जिसके बारे में उन्होंरने रेडियो पर सुना था। यही कारण है कि मैं ऑल इंडिया रेडियो को हरित क्रांति के गुमनाम नायकों में से एक के तौर पर अपना सम्मांन देना चाहूंगा।‘’ दुनिया के सबसे बड़े तेज़ी से बदलते मध्यंम वर्ग समाज के लिए रेडियो के क्यान मायने हैं?  नवीन रेडियो में इस खंड और परिवेश का निर्माण महसूस होता है। स्मार्ट शहरों की अवधारणा के अनुरूप वैश्विक मध्यम वर्ग के नागरिकों के इनमें बसने के लिए तत्काहलिक आवश्युकताएं क्याी हैं, इनमें सर्वथा असंगतता से बचना, सर्वश्रेष्ठर राष्ट्री य मूल्यों  और संस्कृ ति के साथ आधुनिकता का परिवेश, न होकर सभी के लिए समग्रता सुनिश्चित करना शामिल है और यही विशेषताएं राष्ट्री य लोक प्रसारक, आकाशवाणी की भूमिका और महत्व् के मामले में भी रेखांकित होती हैं। अपने आदर्श वाक्यठ  और अपनी परिपाटी एवं नेटवर्कसे सुसज्जित, आकाशवाणी ही संभवत: एकमात्र ऐसा राष्ट्री य मीडिया संस्था न है जिसने समाज के असंख्यए वर्गों को संबोधित करने की दिशा में एक निष्परक्ष और संवेदनशील माध्यहम के रूप में भूमिका निभाई है।  भारत के दिग्भ्रोमित और पथ से भटके युवाओं को सही दिशा दिखाने के मामले में आकाशवाणी ही एकमात्र ऐसा माध्य म रहा है जिसने युवाओं और भाषाई जुड़ाव के लिए वैचारिक संपन्नदता का मंच प्रदान किया। देश के किसी भी शहर/ग्रामीण क्षेत्र में किए गए एक यादृच्छिक ऑडियो सर्वेक्षण में यह उजागर होगा कि भाषाई दिवालियापन के रूप में हमारे युवाओं को आंशिक रूप से इसमें शामिल किया जा रहा है। सार्वजनिक बोलचाल की भाषा हमारे निजी विद्यालयों के पाठ्यक्रमों का हिस्साू नहीं है। आकाशवाणी में अपने विशाल एएम नेटवर्क के साथ उन्हेंम आत्मयविकास की मुख्याधारा में वापस लाने और इस प्रकार से सामूहिक रूप से राष्ट्रक निर्माण में शामिल करने की क्षमता है। आलोचकों का यह तर्क हो सकता है कि इस प्रकार के प्रयास से बहुत कम दूरी को धीरे- धीरे ही तय किया जा सकेगा, लेकिन वे इस बात को समझना नहीं चाहते कि राष्ट्र  निर्माण का कार्य रेडियो पर विज्ञापन या उदघोषकों का कोई कार्यक्रम नहीं है जिसमें येन केन प्रकारेण दो या तीन कमरों के मकानों की बिक्री के प्रयास के लिये किया जाता है अपितु यह सभी घरों के भीतर मानवीय घटकों के सृजन और संरक्षण का कार्य है।
लोक सेवा रेडियो सर्वाधिक लोकतांत्रिक माध्यरम से जानकारी का प्रसार करता है। यह आम जन की भाषा बोलता है और अंतिम व्यिक्ति तक पहुंचता है। रेडियो किसी भी क्षेत्र को न छोड़ते हुए अपने विभिन्न  स्वैरूपों में नाटकों, समाचारों, टॉक शो, संगीत, रनिंग कमेंट्री और विशेष श्रोताओं के लिए विशेष कार्यक्रमों का प्रसारण करता है। रेडियो कल्पाना का संसार है। रेडियो नेत्रहीनों के लिए थियेटर है। रेडियो अंतरंग कथा वाचन का एक माध्येम है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री का नागरिकों से अपने मन की बात कहने के लिए अन्यन माध्येमों की अपेक्षा आकाशवाणी को चुना जाना एक आश्चतर्य से कम नहीं है। किसी ने इस पर चुटकी भी ली है कि जब वे रेडियो पर आते हैं, तो सब लोग सुनने श्रोता उन्हेंी सुनने को उत्सुीक हो उठते हैं! इससे बेहतर हमारे पास कोई उद्धरण नहीं हो सकता, जब प्रधानमंत्री स्वरयं कहते हैं :‘जब हम उन सवालों को छूते हैं (सवाल जो कि हमारे दिलों को छूते हैं) तो हम आम आदमी तक पहुंचने में सक्षम हो जाएंगे।’ इसमें कोई आश्च र्य नहीं कि ‘मन की बात’ को त्विरित सफलता मिली, और यह यथार्थता के साथ एक विस्तृ त घरेलू और वैश्विक दायरे तक पहुंचने का माध्याम भी बन चुका है।
आकाशवाणी देशभर में फैले अपने 422 स्टे‍शनों के साथ, यकीनन दुनिया के सबसे बड़े रेडियो नेटवर्कों में से एक है, जो आबादी के विभिन्नफ हिस्सों  की सेवा करता है। देश के प्रधानमंत्री और लोगों के बीच विचारों के आदान-प्रदान के लिए आकाशवाणी से ज्याैदा सक्षम माध्यसम आपको नहीं मिल सकता। निश्चतय ही, सार्वजनिक सेवा प्रसारण में मन की बात सभी के लिए सर्वश्रेष्ठा मिसाल बन गया है।  रेडियो अनवरत चलने वाला एक गीत है, जो समय के साथ अपनी ताल बदलता है। वह 21वीं सदी के परिवर्तनों के अनुरूप अपने को ढाल कर परस्पगर संवाद और भागीदारी के नए तरीकों को पेश कर रहा है। और ज्या्दा-से-ज्यानदा परस्पकर संवादी बन रहा है। यह बखूबी बयान करता है कि विश्वआ रेडियो दिवस 2017 का विषय ‘’रेडियो आप है!’’ रेडियो प्रसारण की नीति और योजना में दर्शकों और समुदायों की विशाल भागीदारी के लिए आह्वान’’ क्यों है। 

सरिता बघेल



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