बुधवार, 19 जून 2019 | 12:43 IST
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सभी धर्मों का सार- मंदिर, मस्जिद, चर्च आदि प्रार्थना


 सभी धर्मों का सार- मंदिर, मस्जिद, चर्च आदि प्रार्थना स्थल हैं। प्रत्येक ग्राम-नगर, घर-घर जाकर कोई महापुरुष सत्य का प्रचार नहीं कर सकता। पूर्वकाल में महापुरुषों ने शिवलिंग की स्थापना कर दी। लिंग का अर्थ है चिह्न। वह ईश्वर एक है। वह ज्योतिर्मय है। शिवलिंग का अभिप्राय इतना ही है। जो भी महापुरुष ज्योतिर्मय परमात्मा की उपलब्धि वाले थे, उनका शरीर छूटा, तो भक्तों ने उनकी स्मृति में एक शिवलिंग स्थापित कर दिया और उन महापुरुष का नाम भी उससे जोड़ दिया। ज्योतिर्लिंगों ने क्रमश: मंदिरों का रूप ले लिया। 

मंदिरों में अनंतकाल से ईश्वर की उपलब्धि वाले कैवल्य पद प्राप्त तत्वदर्शी महापुरुषों की प्रतिमाएं हैं। उनसे सभी आशीर्वाद लेते हैं। वे हमारे प्रेरणास्रोत हैं। यदि इन स्मारकों में यह नहीं बताया जाता कि किस महापुरुष की प्रतिमा है, उन्होंने क्या संदेश दिया, तो उस मंदिर का दुरुपयोग है। यदि वहां परमात्मा को प्राप्त करने की गीतोक्त विधि बताई जाती है, तो मंदिर का सदुपयोग है। मंदिर खुली पुस्तकें हैं। श्रद्धा के केंद्र हैं। समाज में तरह- तरह के लोग रहते है यदि उन

मंदिरों में गीतोक्त एक परमात्मा ही सत्य है और उसे प्राप्त करने की विधि पर प्रकाश नहीं डाला जाता तो वह उस विद्यालय के समान है, जहां अध्यापक नहीं हैं, केवल घंटे बज रहे हैं। इसलिए गीता का प्रसारण प्रत्येक मंदिर से होना चाहिए। और उनपर अमल भी करना चाहिए

महापुरुषों ने जहां जन्म लिया, तपस्या की, जहां उपदेश दिया, जहां जप किया, जहां महाप्रयाण को प्राप्त हुए, उन सभी स्थलियों पर श्रद्धालुओं ने स्मारक बनाए सभी धर्मस्थल बनाए। यही मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारों का इतिवृत है। धर्म के नाम पर जितने भी संप्रदाय, उपसंप्रदाय बने हैं-सब के सब महापुरुषों के पीछे श्रद्धालुओं का सिमटा हुआ संगठन है, किंतु उस महापुरुष ने क्या पाया? क्या साधना दी? यदि इस पर प्रकाश नहीं डाला, तो उनसे प्रेरणा कैसे मिलेगी? और लोगो के अंदर कैसे भाव जगेगा  आरंभिक प्रेरणा इन स्थलियों से ही मिलती है, किंतु संपूर्ण साधना को प्राप्त करने के लिए किसी तत्वदर्शी महापुरुष की शरण ही जाना होगा। उन्हीं के द्वारा भक्ति की जागृति होती है। ‘भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होईं अनुकूला।।’ 

परमहंस स्वामी अड़गड़ानंदजी कृत

श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य यथार्थ गीता से साभार

 



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