शनिवार, 18 नवंबर 2017 | 11:47 IST
दूसरों की बुराई देखना और सुनना ही बुरा बनने की शुरुआत है।
होम | उत्तराखंड | प्रदेश सरकार के लिए चुनौती बेटियों की संख्या में कमी

प्रदेश सरकार के लिए चुनौती बेटियों की संख्या में कमी


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान समाज की सोच बदलने में फेल रहा है, जिसका अंदाज़ा पहाड़ी इलाकों के लिंग अनुपात में आई कमी को देखकर लगाया जा सकता है। वहीं, पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन के बाद लिंग अनुपात दूसरी ऐसी समस्या है, जो सरकार के सामने बड़ी चुनौती बनता दिख रहा है।

 

 

हालिया जारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल ओखलकांडा ब्लॉक में बेटियों की संख्या 1045 से घटकर मौदूजा साल में 971 रह गर्इ हैं। वहीं, जिले के कोटाबाग ब्लॉक में सबसे कम बालकों पर 705 तो धारी में 820 और भीमताल में 849 बालिकाएं रह गईं हैं, जिसे स्वास्थ्य महकमा भविष्य के लिए बड़े खतरे की आहट के तौर आंक रहा है। इसके अलावा खुद चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की तरफ से अप्रैल से अक्टूबर तक आशा संसाधन केंद्रों से मिले आंकड़ों में भी हालात देखने को मिले हैं।

 

 

बता दें कि स्वास्थ्य महानिदेशालय ने राज्य स्थापना दिवस के मौके पर साप्ताहिक जागरूकता अभियान शुरू किया है, जिसमें बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ दिवस को खासतौर पर तवज्जो दी गई है। गौरतलब है कि साल 2011 की जनगणना में जिले में बालकों पर 914, जबकि अप्रैल 2016 से मार्च 2017 तक बेतालघाट में 950, भीमताल में 965, धारी में 856, कोटाबाग में 860, रामनगर में 897, हल्द्वानी में 930, ओखलकांडा में 1045 और रामगढ़ में 929 था। जिले का औसत लिंग अनुपात में बालकों पर 925 बालिकाएं थीं।

 

 

 

मौजूदा वर्ष के आकड़ों पर नज़र डालें तो अक्टूबर तक रामनगर ब्लॉक में बालकों पर 1019, हल्द्वानी में 902, ओखलकांडा में 971 और रामगढ़ में 933 बालिकाएं हैं, जिससे जिले का औसत घटकर 908 पहुंच गया है और 900 के अनुपात खुद स्वास्थ्य महकमा बेहद संवेदनशील मान रहा है। ऐसे में कोटाबाग, ओखलकांडा, धारी, ओखलकांडा में घटते लिंग अनुपात ने विभाग की चिंता बढ़ा दी है। 



© 2016 All Rights Reserved.
Follow US On: