सोमवार, 23 अप्रैल 2018 | 07:29 IST
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शांत स्वभाव वाले लोग, बुद्धिमान होते है जानिये कैसे ?


गणेश कुमावत

 

जिन्दगी को बेहतर जीने के लिए डिग्री, पैसा की जरूरत नहीं होती, बल्कि शांत स्वभाव का होना जरूरी होता है। लोग कैसे खुश रहते है? क्या करते है? जानिये ये सब के बारे में हम आपको बताने जा रहे है।

 

अक्सर आपने अपने आस-पास के बुद्धिजीवी लोगों का देखा होगा। वे ज्याद चिल्लाते नहीं है। गुस्सा नहीं करते है। सबके साथ सामान्य व्यवहार से बातचीत करते है। ऐसा क्यो ?

 

क्योकि वे बुद्धिमान लोग होते है और दूसरे के लिए ज्यादा कट्टरता की बाते नहीं करते है। दुनिया की कई सर्च में पाया है कि बुद्धिजीवी लोग के बारे में कहा गया है कि वे सिर्फ अपने कार्य को बिना किसी की मदद लिये ही अपने सारे काम-काज निपटा लेते है। साथ ही अपने आस-पास के माहोल्ल को अच्छा और बेहतर बनाये रखते है। चाहे वे किसी भी माहोल्ल में क्यों ना हो।

 

अधिकतर देखा जाता है कि बुद्धिजीवी अपनी उम्र के साथ काफी ऊँचाई छू लेते है और ऊँचाई के साथ-साथ दुनियाँ में कुछ नया व अच्छा काम भी कर जाते है। उनकी जीवनी के साथ-साथ दुनियाँ की कई जिन्दगी को सही रास्ते पर ले आते है। चाहे कम्पनी के माध्यम से हो, चाहे सामाजिक काम-काज के माध्यम से हो या फिर राजनैतिक कार्य के माध्यम से हो। भाषा और संवाद के माध्यम से वे सभी को अच्छा ही बताते है ज्यादातर।

 

ज्यादातर देखने को मिलता है कि उनकी सोच का दायरा इतना बढ़ जाता है कि सत्य, अहिंसा, मावनता, भलाई और प्रगति के साथ-साथ दुनियाँ को अच्छा बनाने में लग जाते है।

 

जहाँ तक हो सकता है कि हम आपको शांत व्यक्ति बनने की सलाह दे सकते है। जरा दुनियाँ की ओर नजर फैलाकर देखिये और सोचिये की महान और बुद्धिजीवी लोग कम क्यों होते है ?

 

ज्यादातर उनको भीड़ में रहते हुऐ देखा होगा। लेकिन दिल और दिमाग से वे हमेशा शांत रहते है और हर रोज कुछ न कुछ नया सोचते ही रहते है।

 

शांत स्वभाव वाले लोग प्रकृति के अति प्रिय होते है। कुदरत की सुन्दरता को देखकर खुश रहते है। दौलत की भूख कभी नहीं होते, जिनता उनको मिलता है उसमें वे सब्र रखते है।

 

जिन्दगी को आनन्दमयी जीते है। निडर, शांत और भाईचारे वाले होते है।

आपको हम बताने जा रहे ऐसे ही उदाहरण:-

• विश्व धर्म सम्मेलन 1893 में स्वामी विवेकानंद अमेरिका के शिकागो शहर पहुंचें। यहाँ सम्पूर्ण विश्व के धर्मों का सम्मेलन आयोजित किया गया था. इस सम्मेलन में एक स्थान पर सभी धर्म गुरुओं ने अपने-अपने धर्म की पुस्तकें रखी थी, वहाँ हमारे देश के धर्म के वर्णन के लिए रखी गयी एक छोटी सी किताब थी- “श्रीमद् भगवत गीता”, जिसका कुछ लोग मजाक बना रहे थे, परन्तू जैसै ही स्वामी विवेकानंद की बारी आई और उन्होंने अपना भाषण दे की शुरुआत की, वैसे ही सारा हॉल तालियों की आवाज से गूंज उठा क्योंकि स्वामी विवेकानंद के द्वारा अपने भाषण की शुरुआत में कहे गये वे शब्द थे- “मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों”, इसके बाद उनके द्वारा किये गये और हमारी धार्मिक किताब श्रीमद् भगवत गीता का सभी ने लोहा माना है। स्वामी विवेकानंद जी के विचार के सामने सारी दौलत-शौहरत और डिग्रियाँ फिक्की पड़ जाती है।

• चाणक्य एक जंगल में झोपड़ी बनाकर रहते थे। वहां अनेक लोग उनसे परामर्श और ज्ञान प्राप्त करने के लिए आते थे। जिस जंगल में वह रहते थे, वह पत्थरों और कंटीली झाडि़यों से भरा था। चूंकि उस समय प्राय: नंगे पैर रहने का ही चलन था, इसलिए उनके निवास तक पहुंचने में लोगों को अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता था। वहां पहुंचते-पहुंचते लोगों के पांव लहूलुहान हो जाते थे।

एक दिन कुछ लोग उस मार्ग से बेहद परेशानियों का सामना कर चाणक्य तक पहुंचे। एक व्यक्ति उनसे निवेदन करते हुए बोला, ‘आपके पास पहुंचने में हम लोगों को बहुत कष्ट हुआ। आप महाराज से कहकर यहां की जमीन को चमड़े से ढकवाने की व्यवस्था करा दें। इससे लोगों को आराम होगा।’ उसकी बात सुनकर चाणक्य मुस्कराते हुए बोले, ‘महाशय, केवल यहीं चमड़ा बिछाने से समस्या हल नहीं होगी। कंटीले व पथरीले पथ तो इस विश्व में अनगिनत हैं। ऐसे में पूरे विश्व में चमड़ा बिछवाना तो असंभव है। हां, यदि आप लोग चमड़े द्वारा अपने पैरों को सुरक्षित कर लें तो अवश्य ही पथरीले पथ व कंटीली झाडि़यों के प्रकोप से बच सकते हैं।’ वह व्यक्ति सिर झुकाकर बोला, ‘हां गुरुजी, मैं अब ऐसा ही करूंगा।’

इसके बाद चाणक्य बोले, ‘देखो, मेरी इस बात के पीछे भी गहरा सार है। दूसरों को सुधारने के बजाय खुद को सुधारो। इससे तुम अपने कार्य में विजय अवश्य हासिल कर लोगे। दुनिया को नसीहत देने वाला कुछ नहीं कर पाता जबकि उसका स्वयं पालन करने वाला कामयाबी की बुलंदियों तक पहुंच जाता है।’ इस बात से सभी सहमत हो गए। यहाँ पर चाणक्य के विचार के सामने सारी दौलत-शौहरत और डिग्रियाँ फिक्की पड़ जाती है।

• राहूल द्रविड़ मैदान और उसके बाहर अपने शांत स्वभाव के कारण जाने जाते हैं। उनकी बल्लेबाजी की भी यही शैली है। कुछ लोगों को उनकी धीमी बल्लेबाजी से शिकयत हो सकती है, लेकिन उनकी क्लासिकल बल्लेबाजी देखना अपने आप में एक अलग आनंद है। द्रविड़ के कुछ आलोचकों ने उन्हें वनडे क्रिकेट के मुताबिक बल्लेबाज नहीं माना, लेकिन द्रविड़ ने इसकी परवाह नहीं की। उन्होंने हर मौके पर खुद को साबित किया। द्रविड़ ने 344 वनडे मैच खेलकर 39.16 की औसत से 10889 रन बनाए हैं और उनके इस रिकॉर्ड को देखकर उनके बल्लेबाजी कौशल पर कौन सवाल उठा सकता है। कई बार द्रविड़ के बल्लेबाजी को लोहा माना है। द्रविड़ को एक आम क्रिकेट प्रेमी वह तवज्जो नहीं देता, जिसके वे हकदार हैं, लेकिन इसकी कभी उन्होंने शिकायत नहीं की और हर तरह के क्रिकेट में रन बनाने का मिशन जारी रखा। यहाँ पर राहुल द्रविड के विचारों और स्वभाव के सामने सारी दौलत-शौहरत और डिग्रियाँ फिक्की पड़ जाती है।

आप भी जरा सोचिऐ जो अपनी जिन्दगी के साथ-साथ दूसरों की जिन्दगी को भी खुशहाल बनाते है।



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