शनिवार, 19 अगस्त 2017 | 06:38 IST
दूसरों की बुराई देखना और सुनना ही बुरा बनने की शुरुआत है।
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भारत विश्व सामाजिक न्याय दिवस के अवसर पर निष्पक्षता सुनिश्चित करने का दृढ़ संकल्प


मार्टिन लूथर किंग ने कहा था कि जहां भी अन्याय होता है वहां न्याय को खतरा है। यह केवल वैधानिक न्याय के बारे में ही नहीं है। विवेकपूर्ण समाज से समावेशी प्रणाली के लिए रंग नस्ल, वर्ग, जाति जैसी किसी भी प्रकार की सामाजिक बाधा से परे न्याेय सुनिश्चित करने की उम्मीलद की जाती है। क्योंकि कोई भी व्यक्ति न्याय से वंचित न हो।  किसी को भी न्याय से वंचित रखना भी सामाजिक न्या्य के सिद्धांतों के खिलाफ है। समावेशी समाज से समान अवसर, निष्पक्ष कार्य और किसी को भी वंचित न रखना सुनिश्चित करने की उम्मीेद की जाती है। यह विश्व सामाजिक न्याय दिवस में अंतरनिहित है। सामाजिक विकास के लिए विश्वि सम्मेलन के उद्देश्य और लक्ष्यों  के अनुरूप संयुक्त राष्ट्र आम सभा में हर साल 20 फरवरी को डब्यूलन  डीएसजे के तौर पर मनाये जाने का फैसला किया गया था। संयुक्त  राष्ट्र ने 26 नवम्बर, 2007 को इस निर्णय को मंजूरी दे दी और 2009 से यह दिवस मनाया जाने लगा। डब्यूिष् डीएसजे मनाने से गरीबी उन्मू‍लन पूर्ण रोजगार और समुचित कार्य को बढ़ावा, लैंगिक समानता, सामाजिक कल्यााण तक पहुंच और सभी के लिए न्याय के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के प्रयासों को सहायता मिलेगी। यह दिवस गरीबी, बहिष्कार और बेरोजगारी जैसे मुद्दों से निपटने के प्रयासों को बढ़ावा देने की आवश्यकता को मान्यता देने का दिन होता है। हमने पाया कि नरेन्द्र  मोदी सरकार इन सामाजिक बुराइयों को जड़ से समाप्त  करने के लिए सक्रियतापूर्वक कई कार्य कर रही है। हाल ही में वेतन भुगतान अधिनियम में संशोधन किया गया है। जिससे चेक द्वारा या बैंक खाते में सीधे वेतन ड़ालने के जरिये भुगतान सुनिश्चित किया जाता है। श्रमिकों के लिए तय किये गये वेतन का पूरा भुगतान सुनिश्चित करना इसका प्रत्यक्ष कारण बताया गया है।
संयुक्त राष्ट्रु का कहना है कि देशों में और राष्ट्र  के बीच शांतिपूर्ण और समृद्ध सह अस्तित्व के लिए सामाजिक न्याय निहित सिद्धांत है। लैंगिक समानता या स्व देशी लोगों और प्रवासियों के अधिकारों को बढ़ावा देते समय हम सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर कायम रहते हैं। लिंग, आयु, जाति, नस्ला, धर्म, संस्कृ्ति या विकलांगता के कारण लोगों द्वारा झेली जा रही असमानता की बाधा को दूर कर हम सामाजिक न्याय की ओर बढ़ सकते हैं।
नये अर्थशास्त्रल की मान्य ता है कि अर्थव्यवस्था समाज और संस्कृंति में घुली-मिली होती है जो पारिस्थिति, जीवन रक्षक प्रणाली से जुड़ी होती है और इस अपरिमित ग्रह पर अर्थव्य‍वस्था हमेशा बढ़ नहीं सकती है।
भारतीय समाज वर्षों से समानता और न्याय सुनिश्चित करने के प्रयास कर रहा है। देश  के इतिहास में सामाजिक न्याय के क्षेत्र में सबसे समर्पित कुछ लोगों में चैतन्य महाप्रभु, स्वामी रविदास, स्वामी विवेकानन्द, एम जी रानाडे, वीर सावरकर, के एम मुंशी, महात्मा गांधी, बाबा साहेब अम्बेडकर, ताराबाई शिंदे, बहरामजी मलाबारी शामिल हैं। इन समाज सुधारकों के दृढ़ निश्चय और साहस के साथ ही लोगों के प्रबल समर्थन से उन्हें  अन्या्य के खिलाफ मजबूत कार्रवाई करने का बल मिला।
भारत सरकार सतत विकास, उचित काम और स्वच्छ नौकरी से संबंधित केवल परिवर्तन के लिए नीतिगत ढांचे को आगे बढ़ाने के अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के 2013 के संकल्प के अनुरूप कार्य कर रही है। आईएलओ के अनुसार महत्वढपूर्ण नीतिगत क्षेत्र मेक्रो इक्नॉमिक्स 3 और प्रगति नीतियां, औद्योगिक तथा क्षेत्रीय नीतियां, उद्यम नीतियां, कौशल विकास, व्यनवसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य , सामाजिक सुरक्षा, श्रम बाजार नीतियां, अधिकार, सामाजिक संवाद और त्रिपक्षीय नीतियां हैं। देश के संविधान में सामाजिक न्याय शब्द‍ का उपयोग व्यापक अर्थों में किया गया है जिसमें सामाजिक और आर्थिक न्याय दोनों ही शामिल हैं। जैसा कि पूर्व मुख्य  न्याकयाधीश पी बी गजेन्द्रं गड़कर ने कहा ‘इस मायने में सामाजिक न्याय का उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों के मामले में प्रत्येक नागरिक को समान अवसर उपलब्ध कराना और असमानता रोकना है।‘ 67वीं संयुक्त राष्ट्र् आम सभा की तीसरी समिति की बैठक में संसदीय कार्य मंत्री श्री अनन्त  कुमार ने दोबारा कहा कि भारत संयुक्तं राष्ट्र  के प्रयासों का पूरा समर्थन करेगा। वह विशेष रूप से ‘संयुक्त राष्ट्र महिला’ का समर्थन करेगा, जिसने अपने गठन के दो वर्ष के भीतर ही महत्वदपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। भारत सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने में संयुक्त् राष्ट्र  की आम सभा के सभी प्रयासों में भी उनकी सहायता करेगा। गौरतलब है कि ‘संयुक्ति राष्ट्र महिला’ लैंगिक समानता, विकास तथा मानक कायम करने के लिए काम करने तथा ऐसा माहौल तैयार करने में विश्व चैंपियन है जहां प्रत्येक महिला और लड़की अपने मानवाधिकार का प्रयोग कर सकती है और अपनी पूरी क्षमता से जी सकती है। सामाजिक न्यारय उपलब्धि कराने के उपाय के तौर पर भारत ने घरेलू हिंसा से महिला की सुरक्षा अधिनियम लागू किया है। जिसमें कहा गया है कि शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सहित कई रूपों में हिंसा हो सकती है। इस अधिनियम में महिलाओं को परिवार के भीतर-वैवाहिक और पारिवारिक दुर्व्यनवहार जैसी हिंसा के खिलाफ लड़ाई लड़ने के वैधानिक प्रावधान है। कानून के अंतर्गत आश्रय, चिकित्‍सीय सहायता, रख रखाव के आदेश और बच्चों् का अस्थासयी संरक्षण के रूप में घरेलू हिंसा से पीडि़त महिलाओं की सहायता की जाती है। काम का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए मनरेगा सबसे बड़ा कार्यक्रम है। कंपनी अधिनियम में कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेकदारी लाभ साझा करने में नया पहलू है। उन्हों ने कहा अत्याकचार पीडि़तों के लिए मुआवजा बढ़ाया गया है और पिछले वर्ष 42,541 लोगों को 139 करोड़ रूपये का मुआवजा दिया गया था। उन्हों ने कहा ‘मंत्रालय के तीन निगमों- राष्ट्री य अनुसूचित जाति वित्ता विकास निगम राष्ट्री य पिछड़ा वर्ग वित्ता विकास निगम और राष्ट्री य सफाई कर्मचारी वित्तं विकास निगम ने डिजिटल तरीके से लगभग दो लाख लाभार्थियों को करीबन 552 करोड़ रूपये वितरित किए। लेकिन विश्व  में स्थिति उतनी अच्छी  नहीं है। संयुक्त राष्ट्रू के आर्थिक मामला विभाग का कहना है कि वैश्विक प्रयासों के बावजूद अमीरों का अमीर होना और गरीबों का गरीब बने रहना एक सच्चाई है। इसके अलावा अत्ययधिक कम आय पाने वाले अति या पूर्ण गरीब व्याकपक पैमाने पर हैं।

 



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