शनिवार, 16 दिसम्बर 2017 | 06:26 IST
दूसरों की बुराई देखना और सुनना ही बुरा बनने की शुरुआत है।
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निराशा नहीं, चुनो जिन्दगी !


गणेश कुमावत

जिन्दगी में कितनी मुस्कीले होती है जब कोई ऐसा महसुस करता है कि हम इस दोस्त से कितने अलग है?

चाहे रोगों से पीड़ित हो, या पैसो से तंगी हो, या विचारों से भिन्न हो या आचरन से दुखी हो।

सीधी सी बात है दोस्तो !

जब किसी को टी.बी. होती है तो घर परिवेश में कुछ ऐसा होता है कि गुमशुदा की तलाश में कोई इंक्वायरी करने आये हो।

सच बड़ा कटवा होता है। घर के परिवेश में इतना दूर दूर रहते है कि टी.बी. मरीज नहीं मरने वाला होता है तो भी उसे भावनाओं की ठेस पहुँचाकर मरने को मजबूर कर दिया जाता है।

वही दूसरी ओर यदि आपको पता लग जाये कि आपके जीवन साथी को, या दोस्त को या फिर आपके बोयफ्रेंड या आपकी गर्लफ्रेंड को एड्स है तो जिन्दगी में क्या होगा ? कभी सोच भी नहीं सकते।

एड्स मतलब सीधा इशारा संक्रमित सूई, दूषित खून, एड्स पीड़ित व्यक्ति के साथ असुरक्षित योनि संबंध से या फिर एड्स संक्रमित माँ से उसके होने वाली संतान को होता है।

एड्स से बनी भ्रांति से दूर रहे। बहुत सारे लोग समझते हैं कि एड्स पीड़ित व्यक्ति के साथ खाने-पीने, उठने-बैठने से हो जाता है, जो कि गलत है। ये समाज में एड्स के बारे में फैली हुईं भ्रांतियां हैं। सच तो यह है कि रोजमर्रा के सामाजिक संपर्कों से एचआईवी नहीं फैलता जैसे कि-

पीड़ित के साथ खाने-पीने से, बर्तनों की साझेदारी से, हाथ मिलाने या गले मिलने से, एक ही टॉयलेट का प्रयोग करने से, मच्छर या अन्य कीड़ों के काटने से, पशुओं के काटने से, खांसी से, छींकों से, पति-पत्नि के आपसी झुठा खाने से, और तो और किसी के साथ रहने से। 

हंसी खुशी के माहोल्ल को एड्स के नाम से खराब ना करे। क्योंकि किसी की मजबूरी में किसी की गलती से किसी को दूषित रक्त की वजह से भी ऐसा हुआ हो। या फिर किसी को एड्स संक्रमित माँ से भी हो सकता है या फिर जहाँ आप कटिंग और सेविंग बनवाने जाते है वहाँ पहले उपयोग में ली हुए ब्लेड से भी हो सकता है। कोई भी वजह हो सकती है।

एड्स में ज्यादा कुछ नहीं होता है। विज्ञान की भाषा में कहे तो सिर्फ उपार्जित प्रतिरक्षी अपूर्णता सहलक्षण (Acquired Immune Deficiency syndrome) एड्स HIV मानवीय प्रतिरक्षी अपूर्णता विषाणु (Human immunodeficiency virus) से होता है, जो कि मानव की प्राकृतिक प्रतिरोधी क्षमता को कमजोर करता है। एचआईवी शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता पर आक्रमण करता है जिसका काम शरीर को संक्रामक बीमारियों, जो कि जीवाणु और विषाणु से होती हैं, से बचाना होता है। एचआईवी रक्त में उपस्थित प्रतिरोधी पदार्थ लसिका-कोशो पर हमला करता है। ये पदार्थ मानव को जीवाणु और विषाणुजनित बीमारियों से बचाते हैं और शरीर की रक्षा करते हैं।

जब एचआईवी द्वारा आक्रमण करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता क्षय होने लगती है तो इस सुरक्षा कवच के बिना एड्स पीड़ित लोग भयानक बीमारियों क्षय रोग और कैंसर आदि से पीड़ित हो जाते हैं और शरीर को कई अवसरवादी संक्रमण यानी आम सर्दी-जुकाम, फुफ्फुस प्रदाह इत्यादि घेर लेती हैं। जब क्षय और कर्क रोग शरीर को घेर लेते हैं तो उनका इलाज करना कठिन हो जाता हैं और मरीज की मृत्यु भी हो सकती है।

दरअसल एचआईवी से संक्रमित लोगों में लंबे समय तक एड्स के कोई लक्षण दिखाई हीं देते। लंबे समय तक (3, 6 महीने या अधिक) एचआईवी का भी औषधिक परीक्षण से पता नहीं लग पाता। अधिकतर एड्स के मरीजों को सर्दी-जुकाम या विषाणु बुखार हो जाता है, पर इससे एड्स होने का पता नहीं लगाया जा सकता। एचआईवी वायरस का संक्रमण होने के बाद उसका शरीर में धीरे-धीरे फैलना शुरू होता है।

ध्यान रहे कि जब किसी को वायरस का संक्रमण शरीर में अधिक होता है, तो उसे समय बीमारी के लक्षण दिखाई देते हैं। एड्स के लक्षण दिखने में 8 से 10 साल का समय भी लग जाता है। ऐसे व्यक्ति को, जिसके शरीर में एचआईवी वायरस हों, पर एड्स के लक्षण प्रकट न हुए हों, एचआईवी पॉजिटिव कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति भी एड्स फैला सकते हैं।

साथ ही सामान्य तौर पर ये लक्षण भी एड्स की ओर इशारा करते है जब बार-बार आपको ये सब होता है तो -

• शरीर में वजन का काफी हद तक कम हो जाना

• लगातार खांसी बने रहना, बार-बार जुकाम का होना

• हैजा, बुखार, सिरदर्द, थकान

• शरीर पर निशान बनना (फंगल इंफेक्शन के कारण)

• भोजन से अरुचि

• लसिकाओं में सूजन

थोड़ा सा ध्यान रहे कि ऊपर दिए गए लक्षण अन्य सामान्य रोगों के भी हो सकते हैं। अत: एड्स की निश्चित रूप से पहचान केवल और केवल औषधीय परीक्षण से ही की जा सकती है व की जानी चाहिए। एचआईवी की उपस्थिति का पता लगाने हेतु मुख्यत: एंजाइम लिंक्ड इम्यूनोएब्जॉर्बेंट एसेस यानी एलिसा टेस्ट किया जाता है।

साथ ही अगर यदि किसी को ऐसा हो भी जाता है तो एचआईवी पोजेटीव के लिए एड्स के उपचार में एंटी रेट्रोवाइरल थैरेपी दवाइयों का उपयोग किया जाता है। इन दवाइयों का मुख्य उद्देश्य एचआईवी के प्रभाव को कम करना, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करना और अवसरवादी रोगों को ठीक करना होता है। समय के साथ-साथ वैज्ञानिक एड्स की नई-नई दवाइयों की खोज कर रहे हैं। लेकिन सच कहा जाए तो एड्स से बचाव ही एड्स का बेहतर इलाज है।

इन सब से परहेज करें जिन्दगी में खुशी जरूर मिलेगी।

एड्स से बचाव के लिए सामान्य व्यक्ति को एचआईवी संक्रमित व्यक्ति के वीर्य, योनिस्राव अथवा रक्त के संपर्क में आने से बचना चाहिए। साथ ही साथ एड्स से बचाव के लिए निम्नलिखित सावधानियां बरतनी चाहिए-

• एड्स से पीड़ित साथी या व्यक्ति के साथ योनि संबंध स्थापित नहीं करना चाहिए, अगर कर रहे हों तो सावधानीपूर्वक कंडोम का प्रयोग करना चाहिए। लेकिन कंडोम इस्तेमाल करने में भी कंडोम के फटने का खतरा रहता है और अपने जीवनसाथी के प्रति वफादार रहें तथा एक से अधिक व्यक्ति से यौन-संबंध न रखें।

• किसी को भी ब्लर्ड की जरूरत हो तो खून को अच्छी तरह जांच करवाकर ही उसे चढ़ाना चाहिए। कई बार बिना जांच के खून मरीज को चढ़ा दिया जाता है, जो कि गलत है। इसलिए डॉक्टर को खून चढ़ाने से पहले पता करना चाहिए कि कहीं खून एचआईवी दूषित तो नहीं है?

• चिकित्सा क्षैत्र में उपयोग की हुई सुइयों या इंजेक्शन का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये एचआईवी संक्रमित हो सकती हैं।

• ध्यान रहे कि दाढ़ी बनवाते समय हमेशा नाई से नया ब्लैड उपयोग करने के लिए कहना चाहिए और जब भी जाये तो ध्यान से पहले ही याद दिला दे।

• एड्स से जुडी हुई भ्रांतियों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।

दोस्तो के साथ भी साधारण व्यवहार करें।

ध्यान रहे रोगों से जितना हो सके उतना ही रोगों बचने की कोशिश करें।

अपनी सेहत में पूरा खान-पान को असर होता है। रोगों का नहीं।



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