सोमवार, 23 अक्टूबर 2017 | 10:33 IST
दूसरों की बुराई देखना और सुनना ही बुरा बनने की शुरुआत है।
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साहित्य है समाज की सबसे बडी जरूरत


इंटरनेट के इस युग में आज भी 35 प्रतिशत आबादी साहित्य लिखने पढ़ने की शौकीन है इंटरनेट ने जहॉ एक वैचारिक क्रांति ला दी है वही बहुत सी गतिविधियो को आलस से भर दिया है एक ओर जहॉ लेखन की प्रतिभा को बढ़ावा मिला है किताबो का प्रचलन दिन प्रतिदिन घटता जा रहा है चाहे वो बाल साहित्य हो या कुछ ओर देखा जाए तो बाल साहित्य पढ़ने में जितना आसान लगता है उसको लिखना उतनी ही टेढी खीर है इंटरनेट के माध्यम से जो साहित्य समाज में परोसा जा रहा है उसमें से अधिकांश निरर्थक है युवा साहित्यकार राजकुमार जैन ने कहा कि साइबर की बढ़ती पैठ से भाषा के संस्कार और हमारी परंपरा दोनों ही दूषित होती जा रही है हिंदी दिवस और मातृ दिवस महज गोष्ठियॉ बनकर रह गई है।इसी क्रम में समय समय पर स्कूलों में चंद कविगोष्ठि आयोजित हो जाती है कवियों को सम्मान दिया जाता है अभी हाल ही में हरियाणा साहित्य अकादमी की ओर से आयोजित शब्द शक्ति की श्रृंखला में दूसरे दिन बाल साहित्य विविध आयाम विषय पर गोष्ठी का आयोजन हुआ रंगारंग कार्यक्रम के साथ बच्चो को साहित्य लिखने और पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया गया मुख्य अतिथि डॉ दिविक रमेश ने कहा कि आज के बच्चो को ध्यान में रखकर हिंदी में उत्कृष्ट बाल साहित्य का सृजन हो रहा है जिसकी पहुँच बड़ों व बच्चो सभी तक होनी चाहिए यह हर आयु के व्यक्ति के लिए होता है यह भ्रम टूटना चाहिए कि बाल साहित्य केवल बच्चो के लिए होता है सिर्फ समझ ही नही बढाता उन्हे सुसंस्कृत भी करता है इसके साथ ही मुख्य अतिथि ने बताया कि रचनात्मक साहित्य कलात्मक अनुभूति होती है विषय आधारित नही इसके लिए विश्वसनीयता और वैज्ञानिक दृष्टि बहुत मायने रखती है बालको में सोचने की नई कल्पना और नए ढ़ग की समझ पैदा करने के लिए सलाहकार समितिक का गठन किया जाना चाहिए  जिससे साहित्य का प्रचार प्रसार सही ढ़ग से किया जा सके।



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