शनिवार, 21 अक्टूबर 2017 | 06:58 IST
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नोटबंदी से संकट में सियासी दल


प्रमोद भार्गव

            पांच सौ और एक हजार की नोटबंदी से आम-आदमी तो हफ्ते-दो हफ्ते में छुटकारा पा लेगा, लेकिन इस पाबंदी से चुनाव के मुहाने पर खड़े राजनीतिक दल जरूर संकट में आए लगते हैं। 2017 में उत्तर-प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, इनकी घोषणा इस साल के अंत तक हो जाएगी। सब जानते हैं कि उत्तर-प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड के चुनावों में धनबली और बाहुबलियों का बोलवाला रहता है। इनमें कालाधान ही नहीं बड़ी मात्रा में पाकिस्तान से छपकर आया जाली धन भी खपाया जाता है। इस लिहाज से धन के बूते चुनावी परचम फहराने वाले भाजपा व कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों के अलावा बसपा, सपा और अकाली दल भी संकट में हैं। इसीलिए नोटबंदी पर अब गहरी सियासत शुरू हो गई है। यदि इन दलों ने चुनावी चंदे में पारदार्शिता अपना ली होती तो शायद इन्हें इस संकट का सामना नहीं करना पड़ता ?

            सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने सीधे-सीधे कह भी दिया है कि ‘राजग सरकार ने उप्र चुनाव के मद्देनजर अचानक बड़े नोटों के चलने पर पाबंदी लगाई है।‘ वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती का कहना है, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह काम शुद्ध राजनीति से प्रेरित है। विधानसभा चुनाव के ठीक पहले विदेषी कालाधन वापस लाने के वादे से ध्यान हटाने के लिए भाजपा सरकार ने बड़े नोटों पर रोक लगाकर आर्थिक आपातकाल जैसी स्थिति पैदा कर दी है।‘ इस बयान पर केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने पलटवार करते हुए कहा है, ‘बहन मायावती को नोटों की मालाओं को छिपाने में परेशानी हो रही है, इसलिए वह प्रधानमंत्री के फैसले की आलोचना कर रही हैं।‘ वहीं अरबिंद केजरीवाल ने सीधे-सीधे सरकार पर तोहमत मढ़ते हुए कहा है, ‘बड़े नोटों को बंद करने के फैसले को पहले ही खास लोगों को लीक कर दिया था।‘ ममता बनर्जी और राहुल गांधी भी काले कारोबार के निर्णय पर अपने-अपने ढंग तंज कस चुके हैं। नीतीश कुमार और शरद पवार जरूर ऐसे नेता रहे हैं, जिन्होंने इस फैसले का स्वागत किया है। साफ है, नोटबंदी से राजनीतिक दल घबराए हुए हैं।

            दलों में बैचेनी इसलिए है, क्योंकि हम सब जानते हैं कि चुनावी मुहिम में काले धन का इस्तेमाल अधिकतम होता है। संभव है, कुछ दलों ने चुनाव के लिए कालाधन एकत्रित भी कर लिया हो ? आने वाले विधानसभा चुनाव के ठीक पहले, सरकार का यह फैसला ऐसे दलों के लिए आपदा से कम नहीं है, जिन्होंने कालाधन इकट्ठा किया हुआ है। बहरहाल हम समझ सकते हैं कि इस फैसले ने अर्थ से जुड़ी राजनीतिक गतिविधियों पर गहरा असर और दूरगामी प्रभाव छोड़ा है। बावजूद इसे दलों की नासमझा ही कहा जाएगा कि वे तात्कालिक महत्व के मोह में उलझे हुए हास्यास्पद जुमले उछाल रहे हैं। जरूरी अब यह है कि सभी प्रमुख दल आगे आकर चंदे में पारदार्शिता की पहल करें। दरअसल यह आशंका निमूर्ल नहीं है कि 6 माह से बड़े नोटों पर प्रतिबंध की कवायद में लगी भाजपा नेतृत्व वाली मोदी सरकार ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को नोटबंदी का इशारा कर दिया हो? यदि ऐसा सच हुआ तो भाजपा के चुनावी अभियान पर इस पाबंदी का कोई असर पड़ने वाला नहीं है। क्योंकि जोड़-तोड़ के जुगाड़ और प्रबंध में माहिर अमित शाह ने अर्थ संबंधी सभी व्यवस्थाएं पूरी कर ली होंगी। यह आशंका बेवजह भी हो सकती है, लेकिन इसके परिप्रेक्ष्य में विपक्षी दलों का राष्ट्रीय दायित्व बनता है कि वे चंदे में पारदार्शिता की पहल करें ?

            दरअसल कालाधन पर पाबंदी और जुर्माने की चेतावनी देने वाली केंद्र सरकार जिस राजनीतिक दल की पीठ पर आरूढ़ है, उस दल भाजपा ने अभी तक पिछले वित्तीय वर्ष की ऑडिट रिपोर्ट भारत निर्वाचन आयोग को नहीं सौंपी है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस भी इसी स्थिति में है। चुनाव आयोग द्वारा दी गई आधिकारिक जानकारी के मुताबिक भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में करीब सात अरब रुपए और प्रमुख विपक्षी कांग्रेस ने पांच अरब रुपए खर्च किए थे। लेकिन दोनों ही दलों ने इस धन के स्रोतों की जानकारी नहीं दी है। इसी तरह बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एक अरब 37 करोड़ रुपए और कांग्रेस ने महज 10 करोड़ रुपए खर्च किए थे। इन जानकारियों से पता चलता है कि चुनावी गंगा में वैतरणी पार लगाने के लिए दल इफरात से काला व सफेद धन खर्च करते हैं। इस प्रदूषित गंगा में जब पाकिस्तन से आया जाली धन भी घुल-मिल जाता है तो यह गंगा और कलुषित हो जाती है।

            उत्तर-प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान दिल्ली पुलिस ने 6 करोड़ के जाली नोटों के साथ दो लोगों को हिरासत में लिया था। हजार-पांच सौ के ये नोट टेम्पों में लदे बोरों से बरामद किए गए थे। उत्तम गुणवत्ता और भारतीय नोटों की हुबहू सत्य प्रतिलिपि लगने वाले ये नोट पाक के पेशावर से छपकर आए बताए गये थे और इनका उप्र के चुनावों में इस्तेमाल होने वाला था। इससे तय होता है कि हमारे नेताओं में चंद नेता ऐसे भी हैं, जिन्हें चुनाव जीतने के लिए देश की मुद्रा से खिलवाड़ की भी कोई परवाह नहीं है। इस तरह की सोच देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करने का काम करती है। गोया, जो नेता परिपक्व और राष्ट्रीय सोच रखते हैं,  उन्हें चुनाव सुधार के लिए आगे आने की जरूरत है। क्योंकि अब तक राजनीतिक दल पारदर्शिता और चैक के जरिए लेन-देन की प्रक्रिया को नकारते रहे हैं।

            दरअसल एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म ने एक जनहित याचिका के जरिए कोशिश की थी कि सभी प्रमुख राजनीतिक दल सूचना अधिकार के कानूनी दायरे में लाए जाएं। इस सिलसिले में केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा 3 जून 2013 को दिए फैसले में छह राष्ट्रीय दलों को इस कानून के तहत ‘पब्लिक ऑथरिटी‘ माना है। इन दलों में भाजपा, कांग्रेस, बसपा, राकांपा, सीपीआई व सीपीएम शामिल हैं। पब्लिक ऑथरिटी से आशय है कि कोई भी नागरिक इन छह दलों से चंदे के आर्थिक स्रोतों की जानकारी हासिल कर सकता है। लेकिन इन सभी दलों ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया। बावजूद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ-साथ अन्य 49 क्षेत्रीय दलों में से चार दल अन्ना द्रमुक, तृणमूल कांग्रेस, जोराम नेशनल पार्टी और सिक्किम लोकतांत्रिक मोर्चे ने जरूर आयोग के ज्यादातर सुझावों का समर्थन किया था।

            सूचना के दायरे में नहीं आने की पैरवी करने वाले दलों ने दलील दी थी कि सरकार से उन्हें कोई आर्थिक मदद नहीं मिलती है, इसलिए सूचना के अधिकार के दायरे में आने का कोई कारण ही नहीं बनता है। जबकि राजनीतिक दलों को पब्लिक ऑथरिटी इसलिए माना गया था, क्योंकि केंद्र व राज्य सरकारें दलों के कार्यालयों के लिए भूमि व भवन तो देती ही हैं। चुनाव प्रक्रिया के दौरान दूरदर्शन व आकाशवाणी पर अपने चुनावी घोषणा-पत्र के प्रसारण के लिए समय मुफ्त में मिलता है। खैर, किसी नैतिकता के दायरे में दलों का नहीं आना इस मानसिकता का संकेत है कि उनके पास ठोस व जायज आय के कोई स्रोत हैं ही नहीं? यहां यह भी गौरतलब है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली यह दावा कर रहे है कि सरकार देश को धीरे-धीरे नकदी-हीन अर्थात कैश-लेस अर्थव्यवस्था की तरफ ले जाना चाहती है। तो फिर यही प्रक्रिया चुनावी चंदे में बरतने की पैरवी वित्त मंत्री क्यों नहीं करते?           

                                              (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 



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