शनिवार, 21 अक्टूबर 2017 | 06:58 IST
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बच्चों को बचा लो !


अंजलि सिन्हा

दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों से छोटी बच्चों-बच्चियों के साथ यौन हिंसा की ख़बरें लगातार आती रही हैं। किसी मामले में हवस का शिकार बना कर जान से मार दिया गया तो कहीं अन्य तरह से हैवानियत कर मरने के कगार पर छोड़ कर आरोपी फरार हो गया तो कहीं अश्लील हरकत को नहीं बताने के लिए डराया धमकाया गया। चिन्ता का मुद्दा है कि इन मासूमों के लिए महफूज समाज कैसे बनें ?

ख़बर आयी है कि बच्चों के अधिकारों के लिए प्रयासरत ‘नेशनल कमीशन फार प्रोटेक्शन आफ चाइल्ड राइटस’ ने पिछले दिनों भीडभाडवाली जगहों पर बच्चों के साथ दुर्व्यवहार/अत्याचार रोकने के लिए जनता तक पहुंचने की योजना बनायी है। ‘जागरूक हो, चुप्पी तोड़रे’ शीर्षक से संचालित इस मुहिम में स्लमों तथा पुनर्वास बस्तियों तक पहुंच कर लोगों को जागरूक करने की कोशिश की जाएगी। स्टीट प्ले तथा छोटी फिल्मों के माध्यम से उन्हें बताया जाएगा कि उनके इर्दगिर्द अगर किसी बच्चे का उत्पीड़न हो रहा है तो आवाज़ उठा दें।

समस्या की विकरालता को स्पष्ट करते हुए कमीशन की तरफ से बताया गया कि बीते 31 अगस्त तक कमीशन ने देश भर से पहुंची 400 से अधिक मामलों पर कार्रवाई की, जिसमें उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली-राष्टीय राजधानी क्षेत्रा के मामले बहुतायत में थे। एक मोटे अनुमान के हिसाब से राष्टीय आयोग औसतन 75 मामलों को प्रति माह लेता है। इसके बरअक्स दिल्ली कमीशन फार प्रोटेक्शन आफ चाइल्ड राइटस की तरफ से 2013 से 2016 के दरमियान 350 से अधिक मामले उठाए गए, जिनमें से 334 मामलों में अदालती कार्रवाई भी शुरू कर दी गयी। यह अलग बात है कि बच्चों को यौन हिंसा से बचाने के लिए बने ‘पोस्को’ अधिनियम का रेकार्ड यह है कि इसमें 85 फीसदी से अधिक मामले लटके हुए हैं। दिल्ली कमीशन ने पाया कि इस कानून की धारा 35/2/ का सरेआम उल्लंघन हो रहा है, जिसमें ऐसे मामलों में अदालती कार्रवाई जल्द से जल्द शुरू करने पर जोर दिया गया है।

इस सम्बन्ध में दिल्ली के ग्यारह जिलों में न्यायाधीशों द्वारा ‘पोस्को’ अधिनियम के तहत दर्ज केसों तथा दिल्ली स्टेट लीगल सर्विसेज आथारिटी के पास दर्ज आंकड़ों का विश्लेषण इसी हक़ीकत को रेखांकित करता है कि इन मामलों के निपटारे में अवरचनागत कमी अर्थात इन्फास्टक्चर की कमी का मसला बड़ा है।/देखें, इंडियन एक्स्प्रेस, 25 अक्तूबर 2016/दिल्ली उच्च अदालत को भेजी अपनी रिपोर्ट में इन न्यायाधीशों ने इस कड़वी सच्चाई को उजागर किया है कि जैसी स्थितियां मौजूद हैं, उसके तहत नियत समय में अदालती कार्रवाई को शुरू तक नहीं किया जा सकता। मालूम हो कि उच्च अदालत बाल यौन अत्याचार मामलों के अदालती कार्रवाइयों में इतने अधिक लटके जाने के मसले पर दो अलग अलग जनहितयाचिकाओं पर गौर कर रही थी। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2016 में बाल यौन अत्याचार रोकने के लिए बने इस कानून के तहत दर्ज मामलों में महज 18.56 मामलों में अभियुक्तों को दंडित किया जा सका। अगर 2014 में पोस्को अधिनियम के तहत दोषसिद्धि की दर  16.33 फीसदी थी तो 2015 में यह दर 19.65 फीसदी तक पहुंची।

न्यायाधीशों द्वारा प्रेषित रिपोर्ट में केसेस के निपटारे में अवरचना की कमी के उदाहरणों का विशेष उल्लेख करते हुए बताया गया कि मामलों में विलंब के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण समय पर फोरेन्सिक रिपोर्ट का न मिलना, एक न्यायाधीश ने इस बात को यह कहते हुए रेखांकित किया कि उसके न्यायालय में सात मामले तीन साल से इस वजह से लटके हुए हैं क्योंकि इस मामले में डीएनए रिपोर्ट जमा नहीं की जा सकी है, जब कई मामले इस वजह से लटके हैं क्योंकि उनकी फोरेंसिक रिपोर्ट नहीं आ सकी है। न्यायाधीशों ने अदालतों में ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए विशेष कक्षों के भारी अभाव की भी चर्चा की, जिसके चलते हालत यह होती है कि उपलब्ध कक्षों में दिन भर में महज दो मामलों की सुनवाई हो पाती है।

‘पोस्को’ मामलों के निपटारे में बेहद विलम्ब और इस मामलो में न्यायाधीश महोदयों द्वारा प्रगट बेचारगी एक बड़े संकट की ओर इशारा करती है, जिसके मुताबिक भारत में भले ही स्त्राविरोधी हिंसा को रोकने के लिए अच्छे कानून बने हों, उनमें हाल में संशोधन भी हुए हों, मगर जहां तक पुलिस की मानसिकता का प्रश्न है, न्यायपालिका के रूख का सवाल है और समाज में व्याप्त नारीद्रोही मानसिकता का प्रश्न अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। इस सम्बन्ध में कुछ साल पहले एशियन सेन्टर फार हयूमन राइटस, के द्वारा जारी एक रिपोर्ट बहुत कुछ कहती है। (इण्डियाज हेल होल्स अर्थात भारत के नरक द्वार) अपनी इस रिपोर्ट में सेन्टर ने दो प्रमुख पहलुओं पर गौर किया था। एक उसका कहना था कि बाल यौन अत्याचार में विगत दस सालों में तीन गुना से अधिक बढ़ोत्तरी हुई है और उसका कथन है कि किशोर न्याय गृहों में रह रहे बच्चे जबरदस्त यौन अत्याचार झेलने के लिए किस तरह अभिशप्त हैं।

रिपोर्ट का आधार नेशनल क्राइम्स रिकार्ड ब्युरो द्वारा समय समय पर संग्रहित आंकड़े हैं। वह बताती है कि विगत दस सालों में अर्थात 2001 से 2011 के दरमियान भारत में बच्चों पर होने वाले बलात्कारों की संख्या 48,338 पहुंची है। अगर वर्ष 2001 में 2,113 मामले सामने आए थे तो वर्ष 2011 तक आते आते इनकी संख्या 7,112 तक पहुंची है। इस बात को मद्देनजर रखते हुए कि अधिकतर मामले पुलिस थानों तक नहीं पहुंचते हैं, अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि वास्तविक संख्या इससे कई गुना अधिक होगी। इस सम्बन्ध में एक कड़वी सच्चाई यह है कि बच्चों के साथ बलात्कार की तमाम घटनाएं जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2000 के अन्तर्गत बने जुवेनाइल जस्टिस होम्स में घटित होती हैं जिनका संचालन या तो सरकार खुद करती है या सरकार की निगरानी में एवं सहायता से किया जाता है। यहां इस बात से फरक नहीं पड़ता कि ऐसे होम्स का संचालन दिल्ली में हो रहा है या कहीं सुदूर की तहसील में।

यह अन्दाजा लगाया जा सकता है कि जुवेनाइल जस्टिस होम्स जिनका निर्माण - कानून के उल्लंघन में फंसे बच्चों एवं ऐसे बच्चे जिन्हें विशेष सहायता एवं सुरक्षा की जरूरत होती है - के लिए किया जाता है, जो एक तरह से इन गृहों पर ही पूरी तरह निर्भर होते हैं, वहां पर ऐसी घटनाओं की शिकायत करना भी कितना मुश्किल हो जाता होगा। आखिर ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या किया जा सकता है।

मालूम हो कि संप्रग सरकार के पहले चरण में भारत सरकार के समाज एवम् बालकल्याण मंत्रालय ने - जब सुश्री रेणुका चौधरी मंत्रालय का कामकाज सम्भाल रही थीं - खुलासा किया था कि भारत में 53 प्रतिशत बच्चें यौन हिंसा के शिकार होते हैं। स्पष्ट है कि इसमें ‘आत्मीय’ कहे जानेवाले दायरों के मामले ज्यादा होते हैं। यह भी उजागर हुआ कि बच्चे बड़ों के द्वारा, अपने गुरुजनों के द्वारा, रिश्तेदारों के द्वारा तो पीड़ित है हीं, वे पर्यटकों द्वारा तथा धार्मिक आस्था के नाम पर भी यौन अत्याचार झेलते हैं। इसमें कभी-कभी उनसे थोड़े बड़े बच्चे भी अत्याचारी बनते हैं।

यह दुखद है कि हमारे समाज में अभी भी भारतीय सभ्यता/परंपरा आदि के नाम पर, संस्कार कह कर बच्चों के साथ इस मसले पर बात करने के पक्षधर नहीं है लोग। अब तो खबर आ रही है की बच्चों का ऑनलाइन उत्पीड़न कैसे होने लगा है। बालपोर्नोग्राफी के धंधे में प्रचण्ड मुनाफा यहभी ख़बर है।

तीसरी दुनिया की तरह हमारे देश में परिवार की पवित्राता की कुछ ज्यादा ही चर्चा होती है, जबकि बाल एवम स्त्रा विरोधी हिंसा के नायाब नमुने वहां नज़र आते हैं। इसीलिए ‘पवित्रा परिवारों’ के सभी रिश्तेदारों पर ऑंख मूंद भरोसा करना भी कोई अक्लमंदी की बात साबित नहीं होगी। यद्यपि शक करना अच्छा गुण नही है, इसके बावजूद मासूमों की हिफाजत अपनी जिम्मेदारी भी है इसलिये स्थिति को भांपना भी सीखना चाहिए।

                               (लेखिका सामाजिक विषयों की जानकार हैँ)



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