बृहस्पतिवार, 23 नवंबर 2017 | 10:40 IST
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नियति का अर्थ


ओशो

नियति का अर्थ होता है, अनिवार्य। होगा ही। टलेगी नहीं बात। चाहे कुछ हो लेकिन यह घटना होकर रहेगी। जैसे मृत्यु नियति है। तुम कुछ करो, न करो, मृत्यु घटेगी। करो, जन्म के साथ ही घट गई। देर-अबेर होने होने वाली है। इस जीवन में मृत्यु के अतिरिक्त और कुछ भी नियति नहीं है। और सब हो सकता है, न भी हो। हो भी सके, न भी हो। तुम पर निर्भर है। तुम्हारे भीतर परम काव्य पैदा होना या नहीं होगा, बस संभावना मात्र है, बीज मात्र है। बीज मात्र है। बीज तो तुम लेकर आए हो। गीत का झरना फूट सकता है। वीणा तुम्हारे हृदय में पड़ी है, झंकार उठ सकता है। मगर उठेगा ही, ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है।

अनिवार्यता तो यांत्रिकता है। और जहां अनिवार्यता है वहां स्वतंत्रता भी नहीं है। अगर संन्यास होगा है कि फिर तुम्हारे स्वतंत्रता क्या रही? फिर तुम्हारी मालकियत क्या रही? फिर तो एक मजबूरी हुई। स्वामित्व न हुआ, एक तरह की यांत्रिक गुलामी हुई।

नहीं, संन्यास नियति नहीं है; बीजरूप संभावना है। सम्हालोगे, सम्हल जाएगी बात ठीक भूमि दोगे, पानी जुटाओगे, सूरज की धूप आने दोगे, श्रम करोगे तो घटेगी। नहीं तो बीज कंकड़की तरह पड़ा रह जाएगा। और जो बीज बीज ही रह गया, उसमें और कंकड़में कोई भेद थोड़े ही है! भेद तो तभी होता जब बीज वृक्ष बनता। भेद तो तभी पता चलता वृक्ष बनकर, आकाश में उठकर, हजार ढंग से प्रकट होकर। प्रकट होता तो भेद पता चलता। बीज बीज ही रह गया तो कंकड़और बीज में क्या फर्क है? कंकड़भी वृक्ष नहीं हुआ, बीज भी वृक्ष नहीं हुआ। बीज वृक्ष हो सकता है लेकिन तुम्हारे बड़े सहयोग की जरूरत होगी।

तुम उलटे विरोध करते हो। तुम्हारे जीवन में परम घटे, इसके लिए तुम सहयोग तो करते नहीं, तुम हजार तरह की बाधाएं खड़ी करते हो। तुम बीज को जमीन दो ऐसा तो नहीं, बीज के आसपास पत्थर जुटाते हो। तुम उलटा ही करते हो।

प्रेम का बीज खिलना चाहिए, तुम धन इकट्ठा करते हो। धन पत्थर की तरह प्रेम के आसपास इकट्ठा हो जाएगा। समर्पण की घटना घटनी चाहिए, समर्पण की जगह तुम अहंकार की शिलाएं इकट्ठी करते हो, चट्टानें इकट्ठी करते हो।

तुम जैसे जीते हो, उस ढंग से तो संभावना मर जाएगी, गर्भपात हो जाएगा। संन्यास का कभी जन्म न होगा। और मैं न कहूंगा कि नियति है क्योंकि नियति कहते ही तुम निश्चिंत हो जाते हो। तुम कहते हो, चलो बोझ उतरा। होना ही है, बात गई।

अब यह भी समझ लेना कि आदमी कितना बेईमान है। जीवन के परम सिद्धांतों का भी बड़ा दुरुपयोग कर लेता है। आदमी ऐसा है कि उसके हाथ में जो पड़जाता है उसका गलत उपयोग करता है। देने वाले जो भी देते हैं, इसलिए देते हैं कि ठीक उपयोग हो सके। जिन्होंने नियति की भाषा बोली, परम ज्ञानी थे। उनका क्या प्रयोजन था?

ऐसे लोग हैं, जिन्होंने कहा नियति है। और उन्होंने क्यों कहा है? उन्होंने कहा है कि तुम्हें यह भरोसा आ जाए कि नियति है तो शायद तुम श्रम करने में लग जाओ। जो होने ही वाला है, फिर हो ही जाने दो। जरूर किसी ने कहा है कि नियति है; बहुतों ने कहा है नियति है। बहुतों ने कहा है, जो होना है वह भाग्य है; होकर रहेगा। मगर उनका प्रयोजन क्या था?

उन महाज्ञानियों ने इसलिए कहा था कि होकर रहेगा, होने ही वाला है। यह इतना जो इसलिए था ताकि तुम उठ आओ नींद से कि जो होने ही वाला है फिर उसे हो ही जाने दो। फिर देर क्यों? फिर कल के लिए क्यों टालना? जो कल होने वाला है, आज हो जाए। फिर कल तक क्यों दुख पाना। फिर कल तक क्यों संताप झेलना? फिर आज ही हो जाने दें। फिर आज ही उसे स्वीकार कर लें। होगा ही तो फिर हम बाधाएं क्यों खड़ी करें? हमारी बाधाएं तो सब टूट जाएंगी और घटना घटेगी।

ज्ञानियों ने कहा था कि तुम बाधा मत खड़ी करना--यह प्रयोजन था जब उन्होंने कहा कि संन्यास नियति है। और ज्ञानियों ने इसलिए कहा था कि अगर तुम्हें नियति की समझ आ जाए तो तुम अतीत से मुक्त हो जाओ। जैसे ही तुम्हें यह समझ में आ जाता है कि कल किसीने गाली दी, वह होने ही वाली ही थी तो गाली देनेवाले का कोई दायित्व नहीं रहा। होना ही था। यह गाली तुम्हें मिलनी नहीं थी। यह तुम्हारा भाग्य था। तो तुम्हारे मन में वैमनस्य नहीं उठता, क्रोध नहीं उठता, प्रतिशोध नहीं उठता क्योंकि जो होना था, हुआ। राह से तुम निकलते थे और एक वृक्ष की शाखा टूट गई और तुम्हारे सिर पर गिर पड़ी और खून निकल आया तो तुम वृक्ष पर मुकदमा नहीं चलाते, न गालियां देते हो, न वृक्ष को लेकर कुल्हाड़ी पहुंचकर काट देते हो। तुम कहते हो यह होना था। संयोग की बात थी कि मैं वृक्ष के नीचे था और कि डाल टूट गई।

साभार

ओषो वर्ल्ड फाउंडेषन, नई दिल्ली



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