शनिवार, 16 दिसम्बर 2017 | 12:45 IST
दूसरों की बुराई देखना और सुनना ही बुरा बनने की शुरुआत है।
अध्यक्ष बनते ही बीजेपी पार्टी पर तगड़े तंज: राहुल गांधी           राहुल गांधी बने कांग्रेस पार्टी के नये अध्यक्ष।          कोयला घोटाले में मधु कोड़ा को 3 साल की सजा, 25 लाख का जुर्माना           तीन तलाक दिया तो 3 साल की सजा होगी ।          केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ट्रिपल तलाक बिल को दी मंजूरी          राहुल गांधी की ताजपोशी 16 दिसंबर को होगी।          कांग्रेस पार्टी के नये अध्यक्ष बनने जा रहे है राहुल गांधी          हिमाचल प्रदेश व गुजरात विधानसभा चुनावों के फैसले 18 दिसंबर को होंगे जारी।          राज्यसभा में विपक्षी दलों का हंगामा।          लोकसभा 18 दिसंबर तक के लिए स्थगित ।          18 दिसंबर को होगा फैसला: भाजपा या कांग्रेस         
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आरुषि-हेमराज हत्याकांड पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला


आरूषि हेमराज के कातिल को एक बार फिर से ढूंढा जा रहा है। साथ ही नौ साल चार महीने और 28 दिन बाद ये सवाल एक बार फिर देश के सामने आ खड़ा हुआ है? कि आखिर आरुषि और हेमराज को किसने मारा? कौन है इन दोनों का कातिल? दरअसल आरुषि और हेमराज के कातिल को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसला सुनाया है। जिसमें जज ने भरी अदालत में कहा 'ये अदालत शक का लाभ देते हुए डाक्टर राजेश तलवार और नुपुर तलवार को आरुषि और हेमराज के कत्ल के इल्ज़ाम से बरी करती है। 

 

 

ज़ाहिर है इस सवाल का जवाब हमारे पास भी नहीं है. वैसे भी जब देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी के पास ही इस सवाल का जवाब नहीं है, तो हमारे पास कहां होगा। लेकिन आरुषि का कातिल जो भी हो पर इतना दावे से कह सकते हैं कि आरुषि केस का कातिल कोई और नहीं बल्कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई ही है। सीबीआई ने ही कत्ल किया है इस केस का, सीबीआई ने ही गुमराह किया कानून को। सीबीआई ने ही कहानी को हकीकत का नकाब पहना कर अदालत को उलझाया है। 

 

 

दरअसल सीबीआई की पूरी कहानी जानने के बावजूद हर किसी के मन में यही सवाल उठ रहा है कि ये कहानी झूठी और अधूरी है। चार साल पहले 25 नवंबर 2013 को सीबीआई की विशेष अदालत ने जब तलवार दंपत्ति को कातिल करार देते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई थी तब भी उस फैसले पर बहस हुई। फैसले पर उंगली भी उठी। तब भी लगा था कि वास्तव में कहानी कुछ और है। लेकिन वकील, दलील और कहानियां तो भरपूर हैं, मगर सबूत, चश्मदीद और थ्योरी गायब थी।

 

 

गौरतलब है कि अदालतें कहानियों पर फैसले नहीं सुनातीं। कहानियों के साथ कहानियों को जोड़ने वाले पात्र और सबूत भी होने चाहिएं। और इस मामले में वही नहीं था। बस इसीलिए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सीबीआई की तमाम कहानियों को अनसुना करते हुए निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह से पलट दिया।



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