रविवार, 22 जुलाई 2018 | 12:24 IST
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एकादशी के साथ चढ़ गया रंग और सजने लगी महफिल


देवभूमि कहे जाना वाले उत्तराखंड में एकादशी के साथ ही होली की मस्ती परवान चढ़ गई है। कुंमाऊं हो या गढ़वाल होली यहां के लिए सबसे खास त्यौहार है। उत्तराखंड में होली के त्योहार को अलग ही रुप में मनाया जाता है। उत्तराखंड में होली ना  सिर्फ रंगो से मनाई जाती है, बल्कि यहां के लोग ढोल-नगाड़े लेकर एक साथ पूरे गांव में घूमते है। साथ ही रंग लगाकर नाचते-गाते है, इन सब में सबसे महत्वपूर्ण होता है औजिया! इसके बिना हमारी उत्तराखंड की संस्कृति अधूरी लगती है, क्योंकि इसके बिना ढोल-नगाड़े भी फीके लगते है। कहा तो यह भी जाता है कि उत्तराखंडी परंपरा के अनुसार जो लोग औजिया बजाते है वे लोग गांव के हर घर जाकर होली के गीत गाते हैं। साथ ही लोग उन्हें उपहार के तौर पर घर के बने पकवान या अनाज देते है।

 


तो वहीं बात करें, अगर उत्तराखंड कुमाऊं की, तो कुमाऊं में होली का त्योहार एक महीने पहले से ही शुरु हो जाता है। वहां गुलाल के साथ-साथ होली के स्पेशल गाने गाए जाते है और  होली के गाने एकादशी को गणेश पूजन से शुरू होकर पशुपतिनाथ शिव की आराधना के साथ खत्म होते हैं। बता दें, वहाँ 2 तरह से होली मनाई जाती है और दोनों के अपने अलग ही महत्व है। पहली होती है खड़ी होली और दूसरी होती है बैठकी होली।

 


बता दें, बैठकी होली में लोग घरों और मंदिरों में गाने गाते है और यह पौष माह के पहले रविवार से शुरू हो जाती है, इसमें रातों को पुरूष सुरीली महफिल जमाते हैं और  महिलाऐं घरों में अपनी अलग महफिल जमाती है, इसमें नाच-गाने से ज्यादा हंसी-ठिठौली होती है, तो वही खड़ी होली की शुरुआत होली के 5 दिन पहले से शुरु होती है और इसमें लोग सफेद कपड़े पहन कर मंदिरों में पूजा करते हैं फिर रंग खेलकर खड़ी होली मनाते हैं। 

 



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